ना जानौं राम कैसा जोगी, अनेक गुफा मधुसूदन भोगी॥खीर खांड घ्रित अंम्रित भोजन, साधनि न्यौंति जिमाऊँ।या कुटी छाडौं और निवासौं, बहुरि न या कुटि आऊँ राम॥आवत जात बहुत मैं किये, इहां न रहणा होई।भगत धन्ना जाट सेवग तेरा, हंस चल्या कुटि रोई॥ ॥साझा करेंसहेजेंअ−अ+
धन्नो कहै ते धिग नरां, धन देख्यां गरबाहिंधन्ना भगतकविताधन्नो कहै ते धिग नरां, धन देख्यां गरबाहिंधन्ना भगत२ मिनट का पाठ