भ्रमत फिरत बहुत जनम बिलाने, तनु मनु धनु नहीं धीरे।लालच बिषु काम लुबध राता, मनि बिसरे प्रभही रे॥ रहाउ॥बिषु फल मीठ लगे मन बउरे, चार बिचार न जानीआ।गुन ते प्रीति बढ़ी अनभांती, जनम मरन फिरि तानिआ॥जुगति जानि नही रिदै निवासी, जलत जाल जम फंध परै।विषु फल संचि भरे मन ऐसै, परम पुरष प्रभ मन बिसरे॥गिआन प्रवेस गुरहि धनु दीआ, धिआनु मानु मन एकमए।प्रेम भगति मानी सुषु जानिआ, त्रिपति अघाने मुकति भए॥जोति समाए समानी जाकै, अछली प्रभु पहिचानिआ।वंनै धनु पाइआ धरणीधरु, मिलि जन संत समानिआ॥

भ्रमत फिरत बहुत जनम बिलाने
धन्ना भगतसबद · लगभग २ मिनट