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हरि-हरि नित समरि उवरिसी

सबद · लगभग २ मिनट
हरि-हरि नित समरि उवरिसी हरि हूं, कांई रे जीहा हरि न कहै।वा ऊवा मरण सराणे वैरी, वासै खुरे त्रोड़तो बहै॥निसदिन नाम जपै नारायण, झाले साँच पड़े म झूठि।दोषी अंत आतम न देखै, पान्ही चढ़हि जरा तो पूठि।प्राणिया नाम सुमिर पुरषोतम, अनि विषय परहरे आल।पग सों पग त्रोड़तौ न पेखे, क्रम-क्रम जाल नाखतो काल।प्रिसण मरण हरि समय पालिस्यौ, मेल्हे मा चित सूध मना।धरि हरि चेत समदि धरणीधर, धरणीधर उवरिसि धना।

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