आजु मैं देखे नंद नंदन पिय।मोर मुकुट मकराकृति कुंडल, निरखि-निरखि हुलस्यौ मेरौ हिय॥नटवर भेष सुदेस स्याम कौ, देखि, न मोहै ऐसी कौन तिय।छीतस्वामी गिरिधरन लाल छबि, चित ही विचारत मुदित होत जिय॥ ॥साझा करेंसहेजेंअ−अ+