अपलक जगती हो एक रात!सब सोये हों इस भूतल में,अपनी निरीहता सम्बल में,चलती हो कोई भी न बात!पथ सोये हों हरियाली में,हों, सुमन सो रहे डाली में,हो अलस उनींदी नखत पाँत!नीरव प्रशांति का मौन बना,चुपके किसलय से बिछल छना,थकता हो पंथी मलय-वात!वक्षस्थल में जो छिपे हुए-सोते हों हृदय अभाव लिये-उनके स्वप्नों का हो न प्रात!

