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चिर तृषित कंठ से तृप्ति बिधुर

कविता · लगभग २ मिनट
चिर तृषित कंठ से तृप्ति बिधुरवह कौन अकिंचन अति आतुरअत्यन्त तिरस्कृत अर्थ सदृशध्वनि कंपित करता बार-बार,धीरे से वह उठता पुकारमुझको न मिला रे कभी प्यार ।सागर लहरों सा आलिंगननिष्फल उठकर गिरता प्रतिदिनजल वैभव है सीमा-विहीनवह रहा एक कन को निहार,धीरे से वह उठता पुकार-मुझको न मिला रे कभी प्यार ।अकरुण वसुधा से एक झलकवह स्मित मिलने को रहा ललकजिसके प्रकाश में सकल कर्मबनते कोमल उज्ज्वल उदार,धीरे से वह उठता पुकार-मुझको न मिला रे कभी प्यार ।फैलाती है जब उषा रागजग जाता है उसका विरागवंचकता, पीड़ा, घृणा, मोहमिलकर बिखेरते अंधकार,धीरे से वह उठता पुकार-मुझको न मिला रे कभी प्यार।ढल विरल डालियाँ भरी मुकुलझुकतीं सौरभ रस लिये अतुलअपने विषाद-विष में मूर्च्छितकाँटों से बिंधकर बार बार,धीरे से वह उठता पुकार-मुझको न मिला रे कभी प्यार ।जीवन रजनी का अमल इंदुन मिला स्वाती का एक बिंदुजो हृदय सीप में मोती बनपूरा कर देता लक्षहार,धीरे से वह उठता पुकार-मुझको न मिला रे कभी प्यार ।पागल रे! वह मिलता है कबउसको तो देते ही हैं सबआँसू के कन-कन से गिन करवह विश्व लिये है ऋण उधार,तू क्यों फिर उठता है पुकार?मुझको न मिला रे कभी प्यार!

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