बिष्णु ध्यांन सनान करि रे, बाहरि अंग न धोई रे।साच बिन सीझसि नहीं, कांई ग्यांन दृष्टैं जोइ रे॥जंबाल मांहैं जीव राखै, सुधि नहीं सरीर रे॥अभिअंतरि भेद नहीं, कांई बाहरि न्हावै नीर रे॥निहकर्म नदी ग्यांन जल, सुंनि मंडल मांहि रे॥ओभूत जोगी आतमां, कांई पेड़ै संजमि न्हाहि रे॥इला प्यंगुला सुषमनां, पछिम गंगा बालि रे॥कहै कबीर कुसमल झड़ै, कांई मांहि लौ अंग पषालि रे॥391॥

