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कोऊ हरि समान नहीं राजा

पद · लगभग २ मिनट
कोऊ हरि समान नहीं राजा।ए भूपति सब दिवस चारि के झूठे करत दिवाजा॥तेरो जन होइ सोइ कत डोलै तीनि भवन पर छाजा॥हात पसारि सकस्ै को जन को बोलि सकै न अंदाजा॥चेति अचेति मूढ़ मन मेरे बाजे अनहद बाजा॥कहि कबीर संसा भ्रम चूको ध्रुव प्रह्लाद निवाजा॥47॥

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