कोऊ हरि समान नहीं राजा।ए भूपति सब दिवस चारि के झूठे करत दिवाजा॥तेरो जन होइ सोइ कत डोलै तीनि भवन पर छाजा॥हात पसारि सकस्ै को जन को बोलि सकै न अंदाजा॥चेति अचेति मूढ़ मन मेरे बाजे अनहद बाजा॥कहि कबीर संसा भ्रम चूको ध्रुव प्रह्लाद निवाजा॥47॥ ॥साझा करेंसहेजेंअ−अ+
सासु की दुखी ससुर की प्यारी जेठ के नाम डरौं रेकबीरकवितासासु की दुखी ससुर की प्यारी जेठ के नाम डरौं रेकबीर२ मिनट का पाठ