गूड़ करि ज्ञान ध्यान करि महुआ भाठी मन धारा।सुषमन नारी सहज समानी पीवै पीवन हारा॥अवधू मेरा मन मतवारा।उन्मद चढ़ा रस चाख्या त्रिभुवन भया उजियारा।दुइ पुर जोरि रसाई भाठी पीउ महारस भारी॥काम क्रोध दुइ किये जलेता छूटि गई संसारी॥प्रगट प्रगास ज्ञान गम्मित सति गुरु ते सुधि पाई।दास कबीर तासु मदमाता। उचकि न कबहूँ जाई॥62॥

