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हे हरि ! यह भ्रमकी अधिकाई

पद · लगभग २ मिनट
हे हरि ! यह भ्रमकी अधिकाई ।देखत, सुनत, कहत, समुझत संसय-संदेह न जाई ॥ १ ॥जो जग मृषा ताप-त्रय-अनुभव होइ कहहु केहि लेखे ।कहि न जाय मृगबारि सत्य, भ्रम ते दुख होइ बिसेखे ॥ २ ॥सुभग सेज सोवत सपने, बारिधि बूड़त भय लागै ।कोटिहुँ नाव न पार पाव सो, जब लगि आपु न जागै ॥ ३ ॥अनबिचार रमनीय सदा, संसार भयंकर भारी ।सम-संतोष-दया-बिबेक तें, व्यवहारी सुखकारी ॥ ४ ॥तुलसिदास सब बिधि प्रपञ्च जग, जदपि झूठ श्रुति गावै ।रघुपति-भगति, संत-संगति बिनु, को भव-त्रास नसावै ॥ ५ ॥

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