हमारा सतगुरु बिरले जानै।सुई के नाके सुमेर चलावै, सो यह रूप बखानै॥की तो जानै दास कबीरा, की हरिनाकस पूता।की तो नामदेव औ नानक, की गोरख अवधूता॥हमरे गुरु की अद्भुत लीला, ना कछु खाय न पीवै।ना वह सोवै ना वह जागै, ना वह मरै न जीवै॥बिन तरवर फल फूल लगावै, सों तो वा का चेला।छिन में रूप अनेक धरत है, छिन में रहैं अकेला॥बिन दीपक उंजियारा देखै, एड़ी समुंद थहावै।चींटी के पग कुंजर बाँधे, जा को गुरू लखावै॥बिन पंखन उड़ जाय अकासे, बिन पंखन उड़ि आवे।सोई सिष्य गुरू का प्यारा, सूखे नाव चलावै॥बिन पायन सब जग फिरि आवै, सो मेरा गुरु भाई।कहै मलूक ता की बलिहारी, जिन यह जुगत बताई॥

हमारा सतगुरु बिरले जानै
मलूकदाससबद · लगभग २ मिनट