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नाइक एक बनजारे पांच

पद · लगभग २ मिनट
नाइक एक बनजारे पांच। बरध पचीसक संग काच॥नव बहियाँ दस गोनी आहि। कसन बहत्तरि लागी ताहि॥मोहि ऐसे बनज स्यो ही काजु। जिह घटै मूल नित बढ़ै ब्याजु॥सत सूत मिलि बनजु कीन। कर्म भावनी संग लीन॥तीनि जगाती करत रारि। चलो बनजारा हाथ झारि॥पूँजी हिरानी बनजु टूटि। दह दिस टाँडो गयो फूटि॥कहि कबीर मन सरसी काज। सहज समानी त भर्म भाजि॥124॥

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