राग धनाश्री ऊधो! हम ही हैं अति बौरी।सुभग कलेवर कुंकुम खौरी। गुंजमाल अरु पीत पिछौरी॥रूप निरखि दृग लागे ढोरी। चित चुराय लयो मूरति सो, री!गहियत सो जा समय अंकोरी। याही तें बुधि कहियत बौरी॥सूर स्याम सों कहिय कठोरी! यह उपदेस सुने तें बौरी॥१६०॥ ॥साझा करेंसहेजेंअ−अ+