अच्यंत च्यंत ए माधौ, सो सब माँहिं समानाँ।ताह छाड़ि जे आँन भजत हैं, ते सब भ्रंमि भुलाँनाँ॥ टेक॥ईस कहै मैं ध्यान न जानूँ, दुरलभ निज पद मोहीं।रंचक करुणाँ कारणि केसो, नाम धरण कौं तोहीं॥कहौ थौं सबद कहाँ थै आवै, अरु फिर कहाँ समाई।सबद अतीत का मरम न जानै, भ्रंमि भूली दुनियाई॥प्यंड मुकति कहाँ ले कीजै, जो पद मुकति न होई।प्यंडै मुकति कहत हैं मुनि जन, सबद अतीत था सोई॥प्रगट गुपत गुपत पुनि प्रगट, सो कत रहै लुकाई।कबीर परमानंद मनाये, अथक कथ्यौ नहीं जाई॥36॥

