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सो कछू बिचारहु पंडित लोई, जाकै रूप न रेष बरण नहीं कोई

पद · लगभग २ मिनट
सो कछू बिचारहु पंडित लोई, जाकै रूप न रेष बरण नहीं कोई॥ टेक॥उपजै प्यंड प्रान कहाँ थैं आवै, मूवा जीव जाइ कहाँ समावै।इंद्री कहाँ करिहि विश्रामा, सो कत गया जो कहता रामा।पंचतत तहाँ सबद न स्वादं, अलख निरंजन विद्या न बादं।कहै कबीर मन मनहि समानाँ, तब आगम निगम झूठ करि जानाँ॥37॥

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