जौं पैं बीज रूप भगवाना, तौ पंडित का कथिसि गियाना॥ टेक॥नहीं तन नहीं मन नहीं अहंकारा, नहीं सत रज तम तीनि प्रकारा॥विष अमृत फल फले अनेक, बेद रु बोधक हैं तरु एक।कहै कबीर इहै मन माना, कहिधूँ छूट कवन उरझाना॥38॥ ॥साझा करेंसहेजेंअ−अ+