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हाशिया
कविता
दुरलभ मानुष-जनम ह्वै पैयतु केहूँ? भाँति
ध्रुवदास
दोहा · लगभग २ मिनट
दुरलभ मानुष-जनम ह्वै पैयतु केहूँ? भाँति।
सोई देखौ कौन बिधि, बादि भजन बिनु जाति॥
॥
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रे मन प्रभुता काल की, करहु जतन है ज्यों न
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वह रस तो अति अमल है, रहै बिचारत नित्त
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श्री राधाबल्लभ लाड़िली
ध्रुवदास
कविता
श्री राधाबल्लभ लाड़िली
ध्रुवदास
२ मिनट का पाठ
आछी छबि सों छबीले सों छबीले बैठे
ध्रुवदास
कविता
आछी छबि सों छबीले सों छबीले बैठे
ध्रुवदास
२ मिनट का पाठ
तब पावै रस सार
ध्रुवदास
कविता
तब पावै रस सार
ध्रुवदास
२ मिनट का पाठ