राम गुन बेलड़ी रे, अवधू गोरषनाथि जाँणीं।नाति सरूप न छाया जाके, बिरध करैं बिन पाँणी॥ टेक॥बेलड़िया द्वे अणीं पहूँती गगन पहूँती सैली।सहज बेलि जल फूलण लागी, डाली कूपल मेल्ही॥मन कुंजर जाइ बाड़ा बिलब्या, सतगुर बाही बेली।पंच सखी मिसि पवन पयप्या, बाड़ी पाणी मेल्ही॥काटत बेली कूपले मेल्हीं, सींचताड़ी कुमिलाँणों।कहै कबीर ते बिरला जोगी, सहज निरंतर जाँणीं॥163॥

राम गुन बेलड़ी रे, अवधू गोरषनाथि जाँणीं
कबीरपद · लगभग २ मिनट