गज साढ़े तै तै धोतिया तिहरे पाइनि तग्गा।गली जिना जपमालिया लौटे हत्थिनि बग्गा॥ओइ हरिके संतन आखि यदि बानारसि के ठग्गा॥ऐसे संत न मोकौ भावहि डाला स्यों पेड़ा गटकावहिं॥बासन माजि चरावहिं ऊपर काठी धोइ जलावहिं॥बसुधा खोदि करहि दुइ चूल्हे सारे माणस खावहिं॥ओई पापी सदा फिरहि अपराधौ मुखहु अपरस कहावहिं॥सदा सदा फिरहि अभिमानी सकल कुटुंब डूबावहिं॥जित को लाया तितही लागा तैसे करम कमावै॥कहु कबीर जिस सति गुरु भेटे पुनरपि जनमि न आवै॥60॥

