सिंधु तैं कढ़ी है किधौं बाड़वा अनल अब,दावा औ जठर मिली कीन्ही ताप भरकी।कीधौं महारुद्र जू के तीसरे विलोचन की,खुलन लगी है कहूँ कोर तेज तरकी॥ग्वाल कवि कहत सुदर्शन को म्यान कीधौं,उघर्यो कहूँ टूटि सीवन है सरकी।हाय विरहीन की कि लाय विरहागिन की,देत है जराय जैठी धूप दुपहर की॥

