मध्या-कलहान्तरिता मैं मति मन्द तिरिअवा, परलेउँ भोरि।ते नहिं कन्त मनवलेउँ, तोहिं कछु खोरि॥५१॥ ॥साझा करेंसहेजेंअ−अ+