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हाशिया
कविता
जो घरही मैं घुसि रहैं, कदली सुवन सुडील
रहीम
दोहा · लगभग २ मिनट
जो घरही मैं घुसि रहैं, कदली सुवन सुडील।
तो रहीम तिनते भले, पथके अपत करील॥८०॥
॥
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जैसी परै सो सहि रहै, कहि रहीम यह देह
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जो नृप बासर निसि कहै, तौ कचपची देखाउ
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