तूँ जिनि छांडै केसवा, मेरे ओर निबाहणहार हो।औगुण मेरे देखि करि, तूँ ना कर मैला मन।दीनानाथ दयाल है, अपराधी सेवग जन हो॥हम अपराधी जनम के, नख-सिख भरे बिकार।मेटि हमारे औगुणाँ, तूँ गरवा सिरजनहार हो॥मैं जन बहुत बिगारिया, अब तुमहीं लेहु सँवारि।समरथ मेरा साईंयाँ, तू आपै आप उधारि हो॥तूँ न बिसारी केसवा, मैं जन भूला तोहि।दादू को ओर निबाहिले, अब जिनि छांडै मोहि हो॥

