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जो रहीम मन हाथ है, मनसा कहुँ किन जाहि

दोहा · लगभग २ मिनट
जो रहीम मन हाथ है, मनसा कहुँ किन जाहि।जल मैं ज्यों छाया परी, काया भीजति नाहिं॥७४॥

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