जो रहीम मन हाथ है, मनसा कहुँ किन जाहि।जल मैं ज्यों छाया परी, काया भीजति नाहिं॥७४॥ ॥साझा करेंसहेजेंअ−अ+
बिन्दु में सिन्धु समान, को कासों अचरज कहैरहीमकविताबिन्दु में सिन्धु समान, को कासों अचरज कहैरहीम२ मिनट का पाठ