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जौ निज मन परिहरै बिकारा

पद · लगभग २ मिनट
जौ निज मन परिहरै बिकारा।तौ कत द्वैत-जनित संसृति-दुख, संसय, सोक अपारा ॥ १ ॥सत्रु, मित्र, मध्यस्थ, तीनि ये, मन कीन्हे बरिआई।त्यागन, गहन, उपेच्छनीय, अहि हाटक तृनकी नाई ॥ २ ॥असन, बसन, पसु बस्तु बिबिध बिधिसब मनि महँ रह जैसे।सरग, नरक, चर-अचर लोक बहु, बसत मध्य मन तैसे ॥ ३ ॥बिटप-मध्य पुतरिका, सूत महँ कंचुकि बिनहिं बनाये।मन महँ तथा लीन नाना तनु, प्रगटत अवसर पाये ॥ ४ ॥रघुपति-भगति-बारि-छालित-चित, बिनु प्रयास ही सूझै।तुलसिदास कह चिद-बिलास जग बूझत बूझत बूझै ॥ ५ ॥

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