कबीरा प्रेम कूल ढरै, हँमारे राम बिना न सरे।बाँधि ले धौंरा सीचि लै क्यारी ज्यूँ तूँ पेड़ भरैं॥ टेक॥काया बाड़ी महैं माली, टहल करै दिन राती।कबहूँ न सोवै काज भँवारे, पाँण तिहारी माती॥सेझै कूवा स्वाजि अति सीतल, कबहूँ कुवा बनहीं रे।भाग हँमारे हरि रखवाले, कोई उजाड़ नहीं रे॥गुर बीज जनाया कि रखि न पाया, मन को आपदा खोई।औरै स्यावढ़ करै षारिसा, सिला करै सब कोई॥जौ घरि आया तौ सब ल्याया, सबही काज सँवार्या।कहै कबीर सुनहु रे संतौ, थकित भया मैं हार्या॥216॥

