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जहँ किछू अहा तहाँ किछु नाहीं पंच तत तह नाहीं

पद · लगभग २ मिनट
जहँ किछू अहा तहाँ किछु नाहीं पंच तत तह नाहीं॥इड़ा पिंगला सुषमन बदे ते अवगुन कंत जाहीं॥तागा तूटा गगन बिनसि गया तेरा बोलत कहा समाई।एह संसा मौको अनदिन ब्यापै मोको कौन कहै समझाई॥जह ब्रह्मांड पिंड तह नाहीं रचनहार तह नाहीं॥जोड़नहारी सदा अतीता इह कहिये किसु माहीं॥जोड़ी जुड़े न तोड़ी तूटै जब लग होइ बिनासी॥काको ठाकुर काको सेवक को काहू के जासी॥कहु कबीर लिव लागि रही है जहाँ बसै दिन राती।वाका मर्म वोही पर जानै ओहु तौ सदा अबिनासी॥80॥

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