रजसि मीन देखी बहु पानी, काल जाल की खबरि न जानी॥ टेक॥गारै गरबनौ औघट घाट, सो जल छाड़ि बिकानौं हाट॥बँध्यो न जानैं जल उदमादि, कहै कबीर सब मोहे स्वादि॥86॥ ॥साझा करेंसहेजेंअ−अ+
सासु की दुखी ससुर की प्यारी जेठ के नाम डरौं रेकबीरकवितासासु की दुखी ससुर की प्यारी जेठ के नाम डरौं रेकबीर२ मिनट का पाठ