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मधुकर! मधुमदमातो डोलत

पद · लगभग २ मिनट
मधुकर! मधुमदमातो डोलत।जिय उपजत सोइ कहत न लाजत सूधे बोल न बोलत॥बकत फिरत मदिरा के लीन्हें बारबार तन घूमत।ब्रीड़ारहित सबन अवलोकत लता-कली-मुख चूमत॥अपनेहूँ मन की सुधि नाहीं पर्‌यो आन ही कोठो॥सावधान करि लेहि अपनपौ तब हम सों करु गोठो।मुख लागी है पराग पीक की, डारत नाहिंन धोई।ताँसों कह कहिए सुनु, सूर, लाज डारि सब खोई॥२७२॥

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