राग धनाश्री
मधुकर! मन तो एकै आहि।सो तो लै हार संग सिधारे जोग सिखावत काहि?रे सठ, कुटिल-बचन, रसलंपट! अबलन तन धौं चाहि।अब काहे को देत लोन हौ बिरहअनल तन दाहि॥परमारथ उपचार करत हौ, बिरहव्यथा नहिं जाहि।जाको राजदोष कफ ब्यापै दही खवावत ताहि॥सुंदरस्याम-सलोनी-मूरति पूरि रही हिय माहिं।सूर ताहि तजि निर्गुन-सिंधुहि कौन सकै अवगाहि?॥१४३॥

