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हाशिया
कविता
ऊंचे बैठे ना लहै गुन बिन बड़पन कोइ
वृंद
दोहा · लगभग २ मिनट
ऊंचे बैठे ना लहै गुन बिन बड़पन कोइ।
बैठो देवल सिखर पर बायस गरुड़ न होइ॥
॥
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जो जाकौ गुन जानही सो तिहिँ आदर देत
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खल बंचत नर सुजन कौं नहि न बिसास करेइ
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गुनी तऊ अवसर बिना आग्रह करै न कोइ
वृंद
कविता
गुनी तऊ अवसर बिना आग्रह करै न कोइ
वृंद
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कन कन जोरै मन जुरै खाते निवरै सोय
वृंद
कविता
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वृंद
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वृंद
कविता
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वृंद
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