पान किए हूँ दवानल कों जेहि को अधरा रस नाहिं डढ़ै री।ताके लगी मुख सी यह जाइ तौ ज्वाल सी ताननि क्यों न गढ़ै री।गोकुलनाथ के हाथ बसौ है बिसासिनि नाथिबे ही की कढ़ै री।छेदति या हिय कों बँसुरी सखि पाहन फोरि कै बाँस कढ़ै री॥ ॥साझा करेंसहेजेंअ−अ+
कैंधौ बिधि कंचन-ज़रीब धरी नारिबे कोगोकुलनाथकविताकैंधौ बिधि कंचन-ज़रीब धरी नारिबे कोगोकुलनाथ२ मिनट का पाठ
जानि मुखचंद चहूँ ओर तें चकोर दौरैंगोकुलनाथकविताजानि मुखचंद चहूँ ओर तें चकोर दौरैंगोकुलनाथ२ मिनट का पाठ
सासन सों पिता के सिंघासन सो त्यागि आइगोकुलनाथकवितासासन सों पिता के सिंघासन सो त्यागि आइगोकुलनाथ२ मिनट का पाठ