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नित उठि कारि गागरिया लै लीपत जनम गयो

पद · लगभग २ मिनट
नित उठि कारि गागरिया लै लीपत जनम गयो॥ताना बाना कछू न सूझै हरि हरि रस लपट्यो॥हमरे कुल कौने राम कह्यो॥जब की माला लई निपूते तब ते सुख न भयो॥सुनहु जिठानी सुनहु दिरानी अचरज एक भयो॥सात सूत इन मुडिये खोये इहु मुडिया क्यों न भयो॥सर्व सखा का एक हरि स्वामी सो गुरु नाम दयो॥संत प्रह्लाद की पैज निज राखी हरनाखसु नख बिदरो॥घर के देव पितर की छोड़ो गुरु को सबद लयो॥कहत कबीर सकल पाप खंडन संतह ले उधरो॥128॥

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