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वहै प्रीति नहिं रीति वह, नहीं पाछिलो हेत

दोहा · लगभग २ मिनट
वहै प्रीति नहिं रीति वह, नहीं पाछिलो हेत।घटत-घटत रहिमन घटै, ज्यों कर लीन्हे रेत॥२३४॥

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