वहै प्रीति नहिं रीति वह, नहीं पाछिलो हेत।घटत-घटत रहिमन घटै, ज्यों कर लीन्हे रेत॥२३४॥ ॥साझा करेंसहेजेंअ−अ+
बिन्दु में सिन्धु समान, को कासों अचरज कहैरहीमकविताबिन्दु में सिन्धु समान, को कासों अचरज कहैरहीम२ मिनट का पाठ