जग सूँ प्रीति न कीजिए, सँमझि मन मेरा।स्वाद हेत लपटाइए, को निकसै सूरा॥ टेक॥एक कनक अरु कामनी, जग में दोइ फंदा।इनपै जौ न बँधावई, ताका मैं बंदा॥देह धरे इन माँहि बास, कहु कैसे छूटै।सीव भये ते ऊबरे, जीवन ते लूटै॥एक एक सूँ मिलि रह्या, तिनहीं सचु पाया।प्रेम मगन लैलीन मन, सो बहुरि न आया॥कहै कबीर निहचल भया, निरभै पद पाया।संसा ता दिन का गया, सतगुर समझाया॥188॥

जग सूँ प्रीति न कीजिए, सँमझि मन मेरा
कबीरपद · लगभग २ मिनट