जाँचिये गिरिजापति कासी। जासु भवन अनिमादिक दासी ॥ १ ॥औढर-दानि द्रवत पुनि थोरें। सकत न देखि दीन करजोरे ॥ २ ॥सुख-संपति, मति-सुगति सुहाई। सकल सुलभ संकर-सेवकाई ॥ ३ ॥गये सरन आरतिकै लीन्हे। निरखि निहाल निमिषमहँ कीन्हे ॥ ४ ॥तुलसिदास जाचक जस गावै। बिमल भगति रघुपतिकी पावै ॥ ५ ॥

