चलन चलन सब को कहत है, नाँ जाँनौं बैकुंठ कहाँ है॥ टेक॥जोजन एक प्रमिति नहिं जानै, बातन ही बैकुंठ बषानै।जब लग है बैकुंठ की आसा, तब लग नाहीं हरि चरन निवासा॥कहें सुनें कैसें पतिअइये, जब लग तहाँ आप नहिं जइये।कहै कबीर बहु कहिये काहि, साध संगति बैकुंठहि आहि॥24॥

