अपने विचारि असवारी कीजै, सहज के पाइड़े पाव जब दीजे॥ टेक॥दै मुहरा लगाँम पहिराँऊँ, सिकली जीन गगन दौराऊँ।चलि बैकुंठ तोहि लै तारों, थकहि त प्रेम ताजनैं मारूँ॥जन कबीर ऐसा असवारा, बेद कतेब दहूँ थैं न्यारा॥25॥ ॥साझा करेंसहेजेंअ−अ+
हम घर सूत तनहि नित ताना कंठ जनेऊ तुमारेकबीरकविताहम घर सूत तनहि नित ताना कंठ जनेऊ तुमारेकबीर२ मिनट का पाठ