आवैगी मेरी बलाय, अरी मोहि गारी दीनी।डारि दई मेरे सिर ते गगरिया, ईंडुरिया गहि छीनी॥करि डारी चिरकुट चोली की, गहि आलिंगन लीनी।दै कपोल दोऊ दिसि चुंबन, अधर सुधा रस पीनी॥लाज गँवाई सब सखियन में, करी आपु आधीनी।तन की दसा बिसरि जु गई मोहि, भई बिकल मत हीनी॥लोक चबाव भयौ घर-घर प्रति, हौं प्रसिद्ध अब कीनी।‘रसिक प्रीतम’ की बात अटपटी, वरनौं कहा नगीनी॥


