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हाशिया
कविता
प्रीतम नहिं कछु लखि सक्यो, आलि कही तिय कान
जमाल
दोहा · लगभग २ मिनट
प्रीतम नहिं कछु लखि सक्यो, आलि कही तिय कान।
नथ उतारि धरि नाक तं, कह जमाल का जान॥
॥
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जमला ऐसी प्रीत कर, जैसी हिंदू जोय
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या तन की भट्टी करूँ, मन कूँ करूँ कलाल
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कविता
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जमाल
कविता
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जमाल
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