गज बर कुंभहिं देखि तनु, कृशित होत मृगराजजमालकवितागज बर कुंभहिं देखि तनु, कृशित होत मृगराज
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गज बर कुंभहिं देखि तनु, कृशित होत मृगराजजमालकविता
स्याम पूतरी, सेत हर, अरुण ब्रह्म चख लालजमालकविता
जमला ऐसी प्रीत कर, ज्यूँ बालक की मायजमालकविता
सज्जन हित कंचन-कलश, तोरि निहारिय हालजमालकविता
जमला ऐसी प्रीत कर, जैसी मच्छ करायजमालकविता
जमला लट्टू काठ का, रंग दिया करतारजमालकविता
नैणाँ का लडुवा करूँ, कुच का करूँ अनारजमालकविता
जमला एक परब्ब छवि, चंद मधे विविचंदजमालकविता
बाल पनैं धोले भये, तरुन पनैं भये लालजमालकविता
पूरी माँगति प्रेम सो, तजी कचौरी प्रीतजमालकविता
सज्जन एहा चाहिये, जेहा तरवर तालजमालकविता
जमला ऐसी प्रीत कर, जैसी हिंदू जोयजमालकविता
प्रीतम नहिं कछु लखि सक्यो, आलि कही तिय कानजमालकविता
या तन की भट्टी करूँ, मन कूँ करूँ कलालजमालकविता
हरै पीर तापैं हरी बिरद् कहावत लालजमालकविता
तरवर पत्त निपत्त भयो, फिर पतयो ततकालजमालकविता
या तन की सारैं करूँ, प्रीत जु पासे लालजमालकविता
जमला ऐसी प्रीत कर, जैसी निस अर चंदजमालकविता
नयन रँगीले कुच कठिन, मधुर बयण पिक लालजमालकविता
प्रीत ज कीजै देह धर, उत्तम कुल सूँ लालजमालकविता
जमला जोबन फूल है, फूलत ही कुमलायजमालकविता
अगर चँदण की सिर घड़ी, बिच बींटली गुलालजमालकविता
सागर तट गागर भरति, नागरि नजरि छिपायजमालकविता
पूनम चाँद कसूँभ रँग, नदी तीर द्रम डालजमालकविता
जमला करै त क्या डरैं, कर-कर क्या पछतायजमालकविता
राधे की बेसर बिचै, बनी अमोलक बालजमालकविता
रे हितियारे अधरमी, तू न आवत लालजमालकविता
कर कंपत लेखनि डुलत, रोम रोम दुख लालजमालकविता
अबसि चैन-चित रैण-दिन, भजहीं खगाधिपध्यायजमालकविता
नैन मिलैं तैं मन मिलैं, होई साट दर हालजमालकविता
जमला जा सूँ प्रीत कर, प्रीत सहित रह पासजमालकविता
सब घट माँही राम है, ज्यौं गिरिसुत में लालजमालकविता
चंपा हनुमत रूप अलि, ला अक्षर लिखि बामजमालकविता
शुतर गिरयो भहराय के, जब भा पहुँच्यो कालजमालकविता
पहिरैं भूषन होत है, सब के तन छबि लालजमालकविता
स्रवन छाँड़ि, अधरन लगे, ये अलकन के बालजमालकविता