मेरी सूचीपढ़ना शुरू करें

वे कुछ दिन कितने सुन्दर थे?

कविता · लगभग २ मिनट
वे कुछ दिन कितने सुन्दर थे?जब सावन-घन-सघन बरसते-इन आँखों की छाया-भर थे!सुरधनु रंजित नव-जलधर से-भरे, क्षितिज व्यापी अम्बर से,मिले चूमते जब सरिता के,हरित कूल युग मधुर अधर थेप्राण पपीहा के स्वर वाली-बरस रही थी जब हरियाली-रस जलकन मालती-मुकुल से-जो मदमाते गंध विधुर थे।चित्र खींचती थी जब चपला,नील मेघ-पट पर बह विरला,मेरी जीवन-स्मृति के जिसमें-खिल उठते वे रूप मधुर थे।

अब कुछ और पढ़ें