पिय तोहि नैनन ही में राखूँ।तेरी एक रोम की छबि पर, जगत वारि सब नाखूँ॥भेटों सकल अंग सावल कों, अधर सुधा-रस चाखूँ।‘रसिक प्रीतम’ संगम की बातें, काहू सों नहिं भाखूँ॥ ॥साझा करेंसहेजेंअ−अ+