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हाशिया
कविता
अति सूक्षम कोमल अतिहि, अति पतरो अति दूर
रसखान
दोहा · लगभग २ मिनट
अति सूक्षम कोमल अतिहि, अति पतरो अति दूर।
प्रेम कठिन सब ते सदा, नित इकरस भरपूर॥
॥
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प्रेम हरी को रूप है, त्यौं हरि प्रेम स्वरूप
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इक अगी बिनु कारनहिं, इक रस सदा समान
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