दौलत पाइ न कीजिये, सपने में अभिमान।चंचल जल दिन चारिको, ठाउँ न रहत निदान॥ठाउँ न रहत निदान, जियत जग में यश लीजै।मीठे बचन सुनाय, बिनय सबही की कीजै॥कह गिरिधर कबिराय अरे यह सब घट तौलत।पाहुन निशिदिन चारि रहत सबही के दौलत॥ ॥साझा करेंसहेजेंअ−अ+