देखा-देखी रसिक न ह्वैहै, रस-मारग है बंगा।कहा सिंह की सरवर करिहैं, गीदर फिरै जु रंका?असहन निंदा करत पराई, कबौं न मानी संका।‘बृंदावन हितरूप’, रसिक जिन, दिय अनन्य-पथ डंका॥ ॥साझा करेंसहेजेंअ−अ+
हौं बलि जाऊँ, मुख सुख-रासचाचा हितवृंदावनदासकविताहौं बलि जाऊँ, मुख सुख-रासचाचा हितवृंदावनदास२ मिनट का पाठ