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देखा-देखी रसिक न ह्वैहै

पद · लगभग २ मिनट
देखा-देखी रसिक न ह्वैहै, रस-मारग है बंगा।कहा सिंह की सरवर करिहैं, गीदर फिरै जु रंका?असहन निंदा करत पराई, कबौं न मानी संका।‘बृंदावन हितरूप’, रसिक जिन, दिय अनन्य-पथ डंका॥

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