रैनि गई मति दिन भी जाइ,भवर उड़े बन बैठे आइ॥ टेक॥कांचै करवै रहै न पानी, हंस उड़ा काया कुमिलांनी।थरहर थरहर कंपै जीव, नां जांनूं का करिहै पीव।कऊवा उड़ावत मेरी बहिंयां पिरांनी, कहै कबीर मेरी कथा सिरांनी।॥360॥ ॥साझा करेंसहेजेंअ−अ+
सुरति सिमृति दुई कन्नी मंदा परमिति बाहर खिंथाकबीरकवितासुरति सिमृति दुई कन्नी मंदा परमिति बाहर खिंथाकबीर२ मिनट का पाठ