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मोर तोर की जेवड़ी, वलि वन्ध्या संसार

साखी · लगभग २ मिनट
मोर तोर की जेवड़ी, वलि वन्ध्या संसार।कांसि कहूँ वा सुत कलित, दाझण बारम्बार॥२२॥३६८॥

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