अली पगे रँगे जे रँग सावरे मो पै न आवत लालची नैना।धावत है उतही जित मोहन रोके एकै नहिं घूँघट रोना॥काननि कौ कल नाहि परै सखी प्रेम सो भीजे सुनै बिन बैना।रसखानि भई मधु की मखियाँ अब नेह को बँधन क्यों हूँ छुटै ना॥

अली पगे रँगे जे रँग सावरे
रसखानसवैया · लगभग २ मिनट