काह कहूँ सजनी सँग की रजनी नित बीतै मुकुंद को हेरी।आवन रोज कहैं मनभावन आवन की न कबौं करी फेरी॥सौतिन भाग बढ्यौ ब्रज में जिन लूटत हैं निसि रंग घनेरी।मो रसखानि लिखी बिधना मन मारिकै आपु बनी हौं अहेरी।। ॥साझा करेंसहेजेंअ−अ+